पुष्प कुञ्ज की स्वर्णिम बाहें.
सरोवार का अंतहीन विस्तार।
पर्वतराज का सुद्रिड अंक.
प्रहरी है , उस पुष्प की अभिलाषा के!!!!!!.
पुष्प की अंतहीन जिगासा थी ये
जाये वो देखने ब्रहम स्रृष्टी को!!!!!
लेकर मन मे कुछ हर्षित विचार।
निकल पड़ा पुष्प अविराम यात्रा अपार.
पुष्प की महत्ता ले गई उसे लक्ष्य पर.
पहुंचा मन्दिर मे वो शिव चरणों पर।
आनन्दित हो उठा वो श्रेष्ट आवास पाकर।
भक्त ले गया पुष्प को प्रसाद मानकर।
मंदिर से चला वो नवीन यात्रा पर।
भक्त ने अप्रित किया उसे चिर निंद्रित शव पर.
चला पड़ा वो शमसान की अब यात्रा पर.
चिताग्नी मे पुष्प भी रह गया जलकर.
पुष्प की आकान्क्षा मिटि उसकी समाप्ति पर।
चिता की राख मे निहित पुष्प ने अंत पर.
ली समाधि जाकर अपने ही सरोवर.
सह सखाओं का शोक हुआ घड़ी भर .
ब्रहम स्रृष्टी की इस सत्य उपाधि पर.
शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007
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